Sholay’s jailer Asrani passes away at 84 after wishing everyone happy diwali | शोले के जेलर असरानी का निधन: 84 साल की उम्र में ली आखिरी सांस, 4 दिन पहले अस्पताल में भर्ती हुए थे; अंतिम संस्कार भी हुआ

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आशीष तिवारी/उमेश कुमार उपाध्याय33 मिनट पहले

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फिल्म शोले में जेलर का किरदार निभाने वाले पॉपुलर एक्टर गोवर्धन असरानी का सोमवार दोपहर 1 बजे हुआ। वे 84 साल के थे। असरानी के मैनेजर बाबू भाई थिबा ने दैनिक भास्कर से बातचीत में उनके निधन की खबर की पुष्टि की है। उन्होंने बताया है कि असरानी को 4 दिन पहले अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। उनकी फेफड़ों में पानी भर गया था।

परिवार ने एक्टर का अंतिम संस्कार सांताक्रूज के शांतिनगर स्थित श्मशान में किया। निधन की खबर सामने आने से कुछ समय पहले ही असरानी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से एक पोस्ट के जरिए दिवाली की शुभकामनाएं दी गई थीं।

असरानी के सोशल मीडिया अकाउंट से की गई आखिरी पोस्ट।

मौत को राज रखा चाहते थे असरानी, पत्नी से कहा था- हंगामा मत करना

असरानी के साथ पिछले 20 सालों से काम कर रहे उनके मैनेजर बाबू भाई थिबा ने दैनिक भास्कर को बताया है कि असरानी खुद चाहते थे कि उनकी मौत की खबर किसी को न दी जाए। उन्होंने ये इच्छा अपनी पत्नी के सामने जाहिर की थी। उन्होंने पत्नी से कहा था कि मेरी मौत के बाद कोई हंगामा न हो, जब अंतिम संस्कार हो जाए, तब ही सबको खबर देना। यही वजह रही कि महज परिवार की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार किया गया। इसमें महज 15-20 लोग ही शामिल थे। इंडस्ट्री में खबर नहीं दी गई, जिससे इंडस्ट्री से जुड़ा कोई सदस्य अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ।

असरानी ने अपने एक्टिंग करियर में करीब 350 फिल्मों में काम किया है। इनमें शोले, अभिमान, चुपके-चुपके, छोटी सी बात, भूल भुलैया शामिल हैं। फिल्म शोले में असरानी का बोला गया डायलॉग ‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’ काफी हिट रहा।

दैनिक भास्कर को दिया था आखिरी इंटरव्यू

निधन से ठीक पहले असरानी ने दैनिक भास्कर को आखिरी इंटरव्यू दिया था। उन्होंने अगस्त में शोले के 50 साल पूरे होने के खास मौके पर हमसे बात की थी। उन्होंने फिल्म शोले में जेलर का किरदार निभाने पर कहा था- ‘मुझे फिल्म के बारे में कुछ भी पता नहीं था। मुझे लगा कि प्रोड्यूसर-डायरेक्टर एक रोल के लिए बुला रहा है। मैं मिलने गया तो रमेश सिप्पी के साथ सलीम-जावेद भी मिले। जावेद साहब ने स्क्रिप्ट सुनाई कि अटेंशन हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं। यह किरदार बेवकूफ है, लेकिन ऐसा लगता है कि दुनिया का सबसे समझदार आदमी यही है। मैंने सोचा कि ऐसा किरदार तो कभी नहीं निभाया। उन्होंने मुझे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की एक किताब पढ़ने के लिए दी। उसमें हिटलर के 10-12 पोज थे।’

‘उन्होंने बताया कि हिटलर पब्लिक के बीच आने से पहले अपने कमरे में फोटोग्राफर के साथ आर्मी की ड्रेस पहनकर रिहर्सल करता था। उसमें से 3-4 पोज मैंने पकड़े और किरदार में वैसा ही एटीट्यूड लाया। फिल्म लंबी हो गई थी तो मेरा सीन काट दिया गया था। नागपुर में एक जर्नलिस्ट ने वह सीन देखा और कहा कि वह सीन तो फिल्म की जान है। फिर बाद में मेरे सीन को जोड़ा गया। आज भी लोग मुझे इस किरदार की वजह से पहचानते हैं।’

‘मुझे लग गया था कि जावेद साहब ने जो पढ़कर सुनाया था अगर उसमें गलती की तो डायरेक्टर तो मारेंगे ही, राइटर भी मारेंगे। शूटिंग शुरू होने से 10 दिन पहले तक मैंने डायलॉग की प्रैक्टिस की। मुझे अशोक कुमार की एक बात याद थी कि डायलॉग याद कर लेना, बाकी डायरेक्टर पर छोड़ देना। वो अपने हिसाब से काम निकलवा लेंगे। उसी हिसाब से मैंने शूटिंग पर जाने से पहले पूरी तैयारी कर ली थी। मुझे नहीं लगता कि जेलर के अलावा कोई और किरदार निभा सकता था।’

असरानी ने कहा था- मुझे आज भी लोग जेलर के नाम से पहचानते हैं

आखिरी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- ‘मैं अभी जनवरी में कोटा के पास एक गांव में शूटिंग कर रहा था। सभी गांव वाले इकट्ठा हो गए। उसमें एक चार साल की छोटी सी बच्ची थी। प्रोड्यूसर ने बताया कि बच्ची और उसकी मां मिलना चाहती है। मुझे लगा कि चार साल की छोटी सी बच्ची क्या किसी एक्टर को पहचानेगी, लेकिन वह बच्ची मुझे देखती ही बोली वो असरानी जेलर। मुझे लगता है कि यह एक किरदार की जीत है।’

ये पूरी इंडस्ट्री का नुकसान है- रजा मुराद

दैनिक भास्कर ने असरानी के निधन पर जब रजा मुराद से बात की, तो उन्होंने खबर पर यकीन करने से इनकार कर दिया। कुछ देर अफसोस जताने के बाद उन्होंने कहा, ये बहुत दुखद समाचार है। मेरे तो उस्ताद रहे हैं। उन्होंने 2 साल पढ़ाया है। नमक हराम में मेरे साथ भी थे। ये बहुत बड़ी क्षति है। मैं कल जाऊंगा उनके घर।

वो हमारी इमेजिनेशन की क्लास लेते थे, वो हमारी सीन की क्लास लेते थे, वो इमोशनल मेमोरी की 4-4, 5-5 क्लास लेते थे। उनका पूरा नाम गोवर्धन असरानी है। 1 जनवरी को उनका जन्मदिन होता था। उनकी पहली फिल्म हरे कांच की चूड़ियां थीं। वो हमारे उस्ताद भी थे, वो हमारे साथी भी थे। पहली बार मैंने उनके साथ नमक हराम में काम किया।

उनके डायरेक्शन में भी मैंने काम किया, दिल ही तो है। हंसते-हंसाते रहना उनका जीवन था। मैंने कभी उन्हें दुखी नहीं देखा। हमेशा हंसते मुस्कुराते रहते थे। जाना तो हर किसी को है, लेकिन उन्होंने बहुत काम किया, बहुत शोहरत कमाई। ऐसे टैलेंटेड और वर्सेटाइल एक्टर बहुत कम हुए हैं। विलेन का रोल उन्होंने किया था हेरा-फेरी में और कोशिश में। कॉमेडी तो खैर उन्होंने बहुत फिल्मों में की है। बहुत अच्छा उन्होंने कैरेक्टर रोल किया था, चंद्रू का अभिमान में। ये पूरी फिल्म इंडस्ट्री का नुकसान है। उम्र का उन पर कोई असर नहीं हुआ था। हंसते-खेलते रहते थे। शोले का रोल कौन भूलेगा, अंग्रेजों के जेलर का। वो जहां भी जाते थे पब्लिक उनसे अंग्रेजों के जमाने का जेलर के डायलॉग उनसे सुनना चाहते थे। जब वो हमारे टीचर थे, तो बहुत गंभीर रहते थे, कभी सोचा ही नहीं था कि वो इतने बड़े कॉमेडियन बनेंगे।

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